Monday, 18 November 2013

सोचा न था
 कभी तुमसे मिलेगी  सोचा न था।
कभी तुमसे बातें होगी सोचा न था।
टहलने जायेगी साथ तुम्हारे कभी सोचा न था। 
कभी हास्यहास्पद करेगी साथ तुम्हारे सोचा न था।
कितनी खूबसूरत पल थे वह।
अभी सोचती हुँ क्यों मैं शर्मा गई।
हॅसी तो थी पर मुखर नहीं।
चाहती वह पल पुः मिलें।
तब मुखर होकर भेट।
आह !सोचा न था।
कभी इतनी दूर चली जाऊँगी।
आज भी ललचाती मिलने को।
आज भी कहीं न कहीं स्मरण करती ,मेरी नजरें ढूँढ़ती तुमें।
काश !तुम भी समझती।
पलकें झपकती तो आती नजर,न जाने क्यूँ !
सोचा न था।
आह !सोचा न।
 

Tuesday, 5 November 2013

स्त्री पुष्प की प्रतीत

स्त्री पुष्प की प्रतीत होती है जो अपनी खुशबू से सारे वातावरण को महका देती है.


जिंदगी को जीवंत बनाती स्त्री
जिंदगी को समरसता में जीना सिखाया