सोचा न था
कभी तुमसे मिलेगी सोचा न था।
कभी तुमसे बातें होगी सोचा न था।
टहलने जायेगी साथ तुम्हारे कभी सोचा न था।
कभी हास्यहास्पद करेगी साथ तुम्हारे सोचा न था।
कितनी खूबसूरत पल थे वह।
अभी सोचती हुँ क्यों मैं शर्मा गई।
हॅसी तो थी पर मुखर नहीं।
चाहती वह पल पुः मिलें।
तब मुखर होकर भेट।
आह !सोचा न था।
कभी इतनी दूर चली जाऊँगी।
आज भी ललचाती मिलने को।
आज भी कहीं न कहीं स्मरण करती ,मेरी नजरें ढूँढ़ती तुमें।
काश !तुम भी समझती।
पलकें झपकती तो आती नजर,न जाने क्यूँ !
सोचा न था।
आह !सोचा न।
No comments:
Post a Comment