मेरी वह तमन्ना
मेरी वह तमन्ना
कभी स्मृति बनकर
कभी स्वप्न बनकर
मुझसे जुड़ती
अपने लफ़्जो से मुग्ध करती
देती मुझे क्षणिक सुख
हो जाती संग उसके
परस्पर होती मीठी बातें
भूल जाती सरे बंधन
जो दरिद्रता की दीवारे हैं...........
उस तमन्ना से पुनः जागती
दुखित मन से कहती देख स्वयं
किस तमन्ना की स्मृति में खो चली
क्या स्तिथि बनाली अपनी
मौन बैठी ताकती ,उस पार।
मेरी वह तमन्ना...............
- कागो मादो
No comments:
Post a Comment